50 हजार साल पहले तिब्बती पूर्वजों की खोज आज भी समुदाय व अन्य को निरोगी रखने का सफल माध्यम बन रही है।
समुदाय के लोग एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद से इतर पारंपरिक पद्धति से अपना उपचार कराना ज्यादा बेहतर समझते हैं। हजारों वर्ष पूर्व उनके पूर्वजों द्वारा लिखित चिकित्सा ग्रंथ सोवा-रिपा में हर बीमारी की संजीवनी छिपी हुई है।
इसमें पौधे की जड़, तने और पत्तों के अर्क से दवा बनाई जाती है। जो किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं होती और असाध्य बीमारियों को जड़ समूल नष्ट करती है। क्यू-सी तंत्र में दवा के बनाए जाने व इस्तेमाल के बारे में भी बताया गया है।
चकराता (देहरादून) से आए समुदाय के चिकित्सक थुप्तेन नामदोल ने बताया कि हिमाचल प्रदेश के गंगचेन धर्मशाला के मेन-टीसी-खांग तिब्बत मेडिकल एस्ट्रोलॉजिकल इंस्टीट्यूट आफ एचएच द दलाईलामा में इसी चिकित्सा ग्रंथ के आधार पर कोर्स तैयार किया गया है।
समुदाय के लोग एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद से इतर पारंपरिक पद्धति से अपना उपचार कराना ज्यादा बेहतर समझते हैं। हजारों वर्ष पूर्व उनके पूर्वजों द्वारा लिखित चिकित्सा ग्रंथ सोवा-रिपा में हर बीमारी की संजीवनी छिपी हुई है।
इसमें पौधे की जड़, तने और पत्तों के अर्क से दवा बनाई जाती है। जो किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं होती और असाध्य बीमारियों को जड़ समूल नष्ट करती है। क्यू-सी तंत्र में दवा के बनाए जाने व इस्तेमाल के बारे में भी बताया गया है।
चकराता (देहरादून) से आए समुदाय के चिकित्सक थुप्तेन नामदोल ने बताया कि हिमाचल प्रदेश के गंगचेन धर्मशाला के मेन-टीसी-खांग तिब्बत मेडिकल एस्ट्रोलॉजिकल इंस्टीट्यूट आफ एचएच द दलाईलामा में इसी चिकित्सा ग्रंथ के आधार पर कोर्स तैयार किया गया है।

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